यूपी के करीबी मुकाबलों में क्यों बीजेपी पड़ी महागठबंधन पर भारी?

यूपी के करीबी मुकाबलों में क्यों बीजेपी पड़ी महागठबंधन पर भारी?

नई दिल्ली:

UP Election

यूं तो लोकतंत्र में हार- जीत लगी रहती है भले ही हार- जीत एक वोट से हो या एक लाख वोटों से।
लेकिन 2019 के आम चुनाव में यूपी में छोटी हार जीत , कई बड़े राजनीतिक संदेश देती है।

ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्यों की यूपी में बीजेपी का मुकाबला ऐसे गठबन्धन से था जो कि कागज़ो में जातिगत आधार पर बीजेपी से काफी मज़बूत था।

सपा , बसपा और रालोद दलित,मुस्लिम,यादव और जाट समीकरण के साथ मैदान में थे, जबकि बीजेपी मुख्यतः हिंदू स्वर्ण , गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित के समीकरण और मोदी फेस के सहारे चुनावी मैदान में थी।

बात करें पूर्वी यूपी की जहां पर जातीय राजनीति काफी हावी रही है और जातिगत समीकरण के अनुसार गठबन्धन काफी मजबूत है लेकिन पूर्वी यूपी में भी बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे के सहारे अप्रत्याशित जीत हासिल कर सभी जातिगत समीकरणों को ध्वस्त कर दिया।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि करीबी मुकाबलों में ज्यादा नुकसान बसपा का ही हुआ गठबंधन में सपा के मुकाबले। जबकि गठबंधन में शामिल रालोद को भी मुजफ्फरनगर और बागपत काफी कम अंतर से सीट गंवानी पड़ी।
मुजफ्फरनगर में 6,526 वोटो से बीजेपी ने रालोद मुखिया अजीत सिंह को मात दी जबकि बागपत में 23,128 वोटों से जयंत चौधरी को मात खानी पड़ी।
रालोद की बड़ी हार का कारण था कि उनका कोर वोट जाट समाज ही उनके तरफ नहीं है और वो बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो चुका है और इसका कारण है अजीत सिंह की राजनीतिक असक्रियता।

पूर्वी यूपी में संत कबीर नगर और बस्ती सीट की बात करे जहां पर बीएसपी जातिगत आधार पर मजबूत है लेकिन वहां भी उसे करीब 30,000 वोटों के अंदर से सीट गंवानी पड़ी और यह सब इसलिए हुआ क्योंकि गठबंधन में एक दूसरे का वोट ट्रांसफर नहीं हुआ।
कहीं अगर बसपा का प्रत्याशी चुनाव लड़ रहा था तो वहां पर सपा से अंदर खाने विरोध का सामना करना पड़ रहा था और अगर सपा का प्रत्याशी चुनाव लड़ रहा था तो वहां पर बसपा से अंदर खाने विरोध का सामना करना पड़ा रहा था गठबन्धन को।

UP Election

बात करते हैं मछलीशहर सीट की जहां पर बीजेपी महज़ 181 वोटों से चुनाव जीत पाई बीएसपी से और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह दलित बाहुल्य सीट है क्योंकि यहां पर 25% के आसपास दलित समाज रहता है।
लेकिन राजनीतिक जटिलताओं से उलझी हुई सीट भी बीजेपी ने अपनी झोली में डाल ली।
मछलीशहर में निषाद समाज भी अच्छी संख्या में रहता है जो कि अंतिम समय में बीजेपी के साथ गया।
इसका कारण था समाजवादी पार्टी की रणनीतिक गलती और बीजेपी का निषाद पार्टी से गठबन्धन होना जिससे निषादों का विश्वास बीजेपी पर बढ़ गया।

राबर्ट्सगंज जहां पर बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल चुनाव लड़ रही थी। वहां पर भी बीजेपी गठबंधन ने करीब 54, 000 मतों से विजय प्राप्त की।
जबकि रॉबर्ट्सगंज यूपी की इकलौती सीट है जहां पर एसटी समाज भी अच्छी संख्या में रहता है और एसटी और एससी को मिला दें तो इस समाज की संख्या यहां पर करीब 43% है।
रॉबर्ट्सगंज में एससी-एसटी समाज ने खुलकर बीजेपी का साथ दिया जो की बीजेपी की बड़ी जीत का कारण बना।

मछली शहर के अलावा पश्चिमी यूपी में मेरठ में बीजेपी ने 4729 वोट से बीएसपी को हराया तो वहीं बीएसपी ने श्रावस्ती में बीजेपी को 6768 वोटों से हराया।

अगर बीजेपी की सफलता की बात करें तीन लाइनों में तो ये तीन महत्वपूर्ण बातें सामने आती है।

1-सपा बसपा रालोद गठबंधन में वोट ट्रांसफर नहीं हुआ। या यूं कहें कि गठबंधन के वोटरों ने गठबंधन की दूसरी पार्टियों पर भरोसा नहीं किया।

2-महिलाओं ने दिल खोलकर मोदी को वोट दिया चाहे वह किसी भी समाज की क्यों ना हो और इसका कारण था केंद्र सरकार की योजनाएं चाहे वह उज्जवला योजना हो या प्रधानमंत्री आवास योजना।

3- पीएम मोदी का चेहरा, उनकी ईमानदार छवि और जनता में नरेंद्र मोदी के प्रति विश्वास जिसकी वजह से लोगों ने सांसद प्रत्याशी को नज़रंदाज़ कर मोदी के नाम पर वोट किया।